आज घर लौटते समय रास्ते में गाड़ी का रेडियो साफ नही आ रहा था। काफ़ी कोशिश करने के बाद भी कोई भी प्रसारण ठीक से सुनाई नही पड़ता था। फ़िर एक सेवा पर कोई पुराना संगीत बजता जान पड़ा। गाना बेशक अंग्रेज़ी था, पर रडियो की किर-किर ने कुछ यादें ताज़ा कर दीं!
याद आया रविवार के रोज़ सुबह ९ बजे का विविद भारती का प्रसारण जिसमें फिल्मी संगीत सुनते मैं और पड़ोस का एक मित्र नाइ की दुकान के बाहर बैठे संगीत से अधिक उस किर-किर का आनंद ले रहे थे। पाँच रुपये का हेयर कट, एक रुपये की कुल्हड़ वाली चाय, और 'फिल्मी कलियाँ' की नवीनतम प्रति पर प्रकाशित अभिनेत्रियों के चित्र। बाल कटाने आए सभी लोगों का बस यही काम होता था। और घर से मिली पिताजी की अग्या का पालन करते हुए बालों का कुतर्वाना इतना नापसंद था की कई बार नाइ से निवेदन करना पड़ता की "भइया कुछ तो छोड़ दो सर पे"!
पर वह पट्ठा भी एक रत्ती ज़्यादा नही छोड़ता था... पिताजी के दिए चिरस्थायी निर्देश जो थे! ऊपर से बैठे बैठे बोरियत आती थी... बाल कटाने के लिए चलता हुआ क्रिकेट मैच जो छोडके आये होते थे - वह क्रिकेट मैच जिसके लिए तड़के ५ बजे से मैदान में किल्ली गाड़ने हम ही गए थे की कोई और वो जगह न हथिया ले। मन मसोस के आना पड़ता था!
फ़िर बाल कटा के घर जाते ही नहाना! यानी रविवार की ऐसी की तैसी। १० बजे तक अगर नहा न पाते, तो नाश्ते से वंचित रह जाते! फ़िर नाश्ता करके पिताजी को पूरे हफ्ते की कराई गई स्कूल की पढाई का ब्योरा दो! जाने हर रविवार को ही उन्हें हमारी पढाई में इतनी रूचि क्यों आन पड़ती थी? और घर से बाहर नज़र पड़े तो यों लगता था, मनो मुझे छोड़ बाकी सारी दुनिया के बच्चे खेल रहे हों! बीच में अगर टी-वी देखना हो तो पढ़ाई के घंटों का हिसाब देना पड़ता था। दो ढाई बजे खाना खाने के बाद जब वे सोने जाते, तब कहीं साँस में साँस आती थी। फ़िर कडी धूप में छुप छुपा कर बाहर निकल कर शाम तक खेलते! शाम को घर आकर फ़िर नहाने की कसरत! फिर कुछ देर सब साथ बैठ कर गप्पें मारते। यही एक समय था जब पिताजी भी पढ़ाई का ज़िक्र नही करते थे। उसी समय से दोस्त के घर दावत की भूमिका बाँधी जाती थी। असल में हफ्ते भर के जेब खर्च से बचाए पैसे इकठ्ठा करके दोस्तों के साथ ढाबे पर खाने का प्रोग्राम होता
१ रुपये की तन्दूरी रोटी, ५ रुपये की सब्जी, और १२ रुपये का चिकन। १५ मिनट का खाना और एक डेढ़ घंटे बातें। अपने अद्यापकों की टांग खींचना, लड़कियों की बातें करना और अगली शाम के खेलने का कार्यक्रम भी तय होता था। फ़िर लौटते हुए किशन भइया के यहाँ से मीठा पान भी खाना होता था... पान बनते बातें करते, रेडियो पर चलते संगीत के साथ वाही किर-किर।
घर पहुँचते ही गाड़ी पार्क करके मैं ज्यों ही घर में घुसा, शीशे पर अपने ही चेरे पर मुस्कान नज़र आई। एक रडियो की किर-किर से अपने बचपन का एक रविवार मैंने फ़िर जी लिया!!!
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)

0 टिप्पणियाँ:
एक टिप्पणी भेजें