सोमवार, 17 मार्च 2008

सम्पूर्णता का शून्य

भय कोई न मन में शेष रहा, जब कोई न मन में द्वेष रहा
जब प्रेम ह्रदय में इतना था, की कोई न मन में क्लेश रहा
जब सफलता पैरों पर थी, और शीश गगन से ऊंचा था,
तब अनुभव पहली बार हुआ... सम्पूर्णता का शून्य

अब सब कुछ मेरे पास सही, पर खालीपन क्यों लगता है?
मनवांछित स्तर पर आकर अब यह मन क्यों मुझको ठगता है?
क्षणभंगुर विजय का अनुभव है, फ़िर वहि प्यास सताती है
“मुझे और चाहिए... और चाहिए” प्यास ये बढ़ती जाती है
इक दिवस चला था जिस दर से, मैं आन वहीं फ़िर पहुँचा हूँ
“जो प्राप्त हुआ, सो प्राप्त हुआ, क्या और मुझे मिल सकता है?”

धरती गोल, सूरज गोल, गोल हर संपन्न एकांकी है
मैंने अपने जीवन को स्वयं गोलाई में चलते देखा है
और शून्य से अच्छा गोलाई का उदाहरण भला अब क्या होगा?
शून्य भी तोह अंततः, एक सम्पूर्ण गोल सी रेखा है
ये जीवन जिस से शुरू हुआ, उसमें इक दिन मिल जायेगा
फ़िर अनुभव मुझको क्यों न हो, सम्पूर्णता का शून्य?

1 टिप्पणी:

बेनामी ने कहा…

ye jeevan sampoorna hai agar aapke paas hai muthi bhar dost, ek madira ka kua aur ek vaatanukoolit kamra - waise jeevan sampoorna hai agar koi chah nahi.... aisa nahi ki chah nahi to rah nahi....